मैं मंदिर भी गया हूं, मैं मस्जिद भी गया हूं!

मैं चंद लम्हे किसी अस्पताल भी रहा हूं!

माहौल ज़रा सा भी अलग ना लगा था,

रोते भिलखते सब भीख मांग रहे थे दोनों जगह!

एक और जहाँ धर्म के नाम पर धंधा था,

तो दूसरी और धर्म का धंधा था!

एक और जहा भगवान पत्थर का था,

दूसरी ओर लो-मांस का पुतला था!

कुछ लाए थे शिकायते तो कुछ को चमत्कार से खुश भी थे,

कुछ को लाई मज़बूरी थी तो कुछ को भरोसा भी था!

कुछ ने खोए है परिवार, उम्मीदें और भरोसा भी,

कुछ पहुंचे थे देर से, कुछ ना पहुंचे वक्त रहते भी!

कुछ के बुलंद थे हौसले, कुछ टूट से गए,

कुछ बुला पाए दर्द को, कुछ उनका हिस्सा बन गए!

भीड़ दोनों जगह आशा और उम्मीद लेकर उमड़ी थी,

पर जो प्राथना मैने अस्पताल मे सुनी वो ज्यादा सच्ची थी!

 


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